रिव्यू: कर ले प्यार कर ले

Jan 18 • फ़िल्म -समीक्षा, मनोरंजन • 138 Views • No Comments on रिव्यू: कर ले प्यार कर ले

कलाकार : शिव दर्शन, हसलीन कौर, अंकित राज, मुकेश ठाकुर, करण आनंद, रोशन प्रीत, यश आचार्य
निर्माता : सुनील दर्शन
निर्देशक : राजेश पांडे
गीत : राशिद खान, कुमार, सुनील दर्शन, संगीत: मीत ब्रदर्स, प्रशांत सिंह, रेयान अमीन, राशीद खान
अवधि : 137mins
मूवी टाइप : Romance

बॉलिवुड में लंबे अर्से से चल रहे ‘स्टार सन’ के दौर में प्रड्यूसर सुनील दर्शन भी शामिल हो गए हैं। नब्बे के दशक में आमिर खान स्टारर ‘राजा हिन्दुस्तानी’ जैसी फिल्म के प्रड्यूसर रहे दर्शन ने इस फिल्म में अपने साहबजादे को सिल्वर स्क्रीन पर पेश किया है। अब बात जब अपने बेटे को लॉन्च करने की आई तो पापा ने बेटे की फिल्म पर दिल खोलकर पैसा लगाया है।

काश, पापा अपने साहबजादे को कैमरे के सामने पेश करने से पहले इस सचाई को भी जान पाते कि मल्टिप्लैक्स कल्चर के दौर में बॉक्स ऑफिस पर जेन एक्स का बोलबाला है और उन्हें सत्तर-अस्सी के दशक में फिल्मी पर्दे पर परोसे जाने वाले चालू मसालों से कुछ लेना-देना नहीं है। इस फिल्म को देखकर यही लगता है कि दर्शन बरसों बाद भी हीरो-हीरोइन के कुछ सेक्सी सीन्स, हीरो का मुक्का लगते ही हवा में उड़ते गुंडों और कुछ इमोशनल सीन से ही फिल्म को हिट करवाना चाहते हैं। अफसोस, दर्शन का बरसों पुराना आजमाया यह फंडा इस बार बेटे की फिल्म पर पूरी तरह से फ्लॉप रहा।

कहानी: स्कूल के दिनों से कबीर ( शिव दर्शन) और प्रीत ( हसलीन कौर) एक-दूसरे को चाहते हैं। पर कबीर की मां को लगता है प्रीत जब भी उसकी जिदंगी में आती है, तब कबीर के साथ कुछ ना कुछ गलत होता है। बचपन में एक दिन प्रीत के घर पहुंचा कबीर उसके सौतेले पिता पर हमला करता है। दरअसल, प्रीत का सौतेला पिता कबीर के सामने उसकी (प्रीत) मां की पिटाई करता है, तभी वह (कबीर) उस पर हमला करता है। इस घटना में प्रीत का सौतेला पिता बुरी तरह से घायल हो जाता है।

कबीर को पुलिस की कारवाई से बचाने के लिए उसकी मां शहर छोड़कर चली जाती है। करीब 12 साल बाद कबीर की फैमिली फिर उसी शहर में लौट आती है। कॉलेज में कबीर-प्रीत फिर एक बार मिलते हैं। कॉलेज में जैस नाम का खूबसूरत स्टूडेंट-कम-विलन भी है, जो प्रीत पर जान छिड़कता है। जैस का करोड़पति बाप किसी डॉन से कम नहीं। कॉलेज में कबीर और जैस के बीच प्रीत को पाने के लिए शुरू हुई मारामारी में जैस की मौत हो जाती है।

ऐक्टिंग: ना जाने क्यों प्रड्यूसर सुनील दर्शन ने अपने साहबजादे को लॉन्च करने के लिए इस कमजोर स्क्रिप्ट को चुना। बेशक शिव दर्शन ने कुछ फाइट सीन में अपना दमखम दिखाया है लेकिन ऐक्टिंग के मामले में पूरी तरह जीरो साबित हुए। शिव ने फिल्म में अपने सभी डायलॉग चिल्लाते हुए बोले हैं। न्यूकमर हसलीन कौर ने ऐक्टिंग की बजाए अपनी ब्यूटी को कैमरे के सामने ज्यादा परोसने की कोशिश की है। दूसरे कलाकारों की बात की जाए तो, लगभग सभी इस फिल्म में फिसड्डी साबित हुए हैं।

डायरेक्शन: फिल्म देखकर लगता है डायरेक्टर राजेश पांडे कैमरे के पीछे कुछ करने की बजाए शूटिंग के दौरान बस आराम फरमाते रहे। पांडे पूरी फिल्म में किसी भी कलाकार से अच्छा काम नहीं ले पाए हैं। डायरेक्टर स्टार्ट टू लास्ट दर्शकों को कहानी के साथ बांध पाने में नाकाम रहे हैं। इस फिल्म के कुछ सीन्स को देखकर लगता है जैसे डायरेक्टर सेट पर आए ही नहीं और हर किसी ने अपनी मर्जी से कुछ भी कर दिया।

संगीत: ‘आई जो तेरी याद तन्हाई में’ को छोड़ दिया जाए तो फिल्म के बाकी बचे गाने जीरो हैं।

क्यों देखें: अगर हर फिल्म देखने की कसम खा रखी है तो इसको भी देखकर अपनी कसम जारी रखें। वर्ना, हम तो आपसे ऐसा करने की सलाह कभी नहीं देंगे।

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